मारवाड़ी भजन कबीर साहब की एक साखी

मारवाड़ी भजन कबीर साहब की एक साखी :-कहया सुणयारी हे नहीं मारी हेली। परसिया हीं परिहाण । अर्थात:- हमारे धर्म(सतनामी पन्त)और समाज का हर एक नियम मात्र कहने-सुनने का ही नही है बल्कि उन पर चलने का हमारा सामूहिक रूप से पहला दायित्व है। अगर सरे पर नहीं चलते हैं तो हमें सांसारिक जीवन में भी किसी न किसी रूप में दुःख (सजा स्वरूप) मिलता ही है। हमें सदैव सुख ही मिला था अगर दुःख का अन...
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