भीतर के “मैं” का मिटना जरूरी है।

भीतर के "मैं" का मिटना जरूरी है। सुकरात समुन्द्र तट पर टहल रहे थे। उनकी नजर तट पर खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी। वो उसके पास गए और प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा - "तुम क्यों रो रहे हो ?" लड़के ने कहा - "ये जो मेरे हाथ में प्याला है मैं उसमें इस समुन्द्र को भरना चाहता हूँ। पर यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।" बच्चे की बात सुनकर सुकरात विस्माद में चले गये और स्वयं रोने...
Read More

मारवाड़ी भजन कबीर साहब की एक साखी

मारवाड़ी भजन कबीर साहब की एक साखी :-कहया सुणयारी हे नहीं मारी हेली। परसिया हीं परिहाण । अर्थात:- हमारे धर्म(सतनामी पन्त)और समाज का हर एक नियम मात्र कहने-सुनने का ही नही है बल्कि उन पर चलने का हमारा सामूहिक रूप से पहला दायित्व है। अगर सरे पर नहीं चलते हैं तो हमें सांसारिक जीवन में भी किसी न किसी रूप में दुःख (सजा स्वरूप) मिलता ही है। हमें सदैव सुख ही मिला था अगर दुःख का अन...
Read More