मारवाड़ी भजन कबीर साहब की एक साखी

मारवाड़ी भजन कबीर साहब की एक साखी :-कहया सुणयारी हे नहीं मारी हेली।
परसिया हीं परिहाण ।
अर्थात:- हमारे धर्म(सतनामी पन्त)और समाज का हर एक नियम मात्र कहने-सुनने का ही नही है बल्कि उन पर चलने का हमारा सामूहिक रूप से पहला दायित्व है।
अगर सरे पर नहीं चलते हैं तो हमें सांसारिक जीवन में भी किसी न किसी रूप में दुःख
(सजा स्वरूप) मिलता ही है।
हमें सदैव सुख ही मिला था
अगर दुःख का अनुभव हुआ है तो वो मेरी ही अपनी भूल का परिणाम है।
हमें सदैव अपनी ही चूको से सचेत रहकर समाज को सुन्दर और सुदृढ़ बनाये रखना हैं।
सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने में सभी साध-बाई प्रेम पूर्वक पूरा सहयोग करें।

सतनाम

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